अंतरराष्ट्रीय ट्रेड में पिछले कुछ सालों में जिन साझेदारियों की सबसे ज़्यादा चर्चा हुई है उनमें प्रस्तावित रीज़नल कॉम्प्रिहेंसिव इकॉनोमिक पार्टनरशिप यानी आरसीईपी है. हालांकि यह अब तक ज़मीन पर नहीं उतर पाई है लेकिन कई चीज़ों के कारण सुर्ख़ियों में है.
इसमें असोसिएशन ऑफ़ साउथ ईस्ट एशियन नेशन्स यानी आसियान के 10 सदस्य शामिल हैं और साथ में भारत, जापान, चीन, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड हैं.
इसको लेकर केंद्र सरकार के उच्च-स्तरीय सलाहकार समूह ने अपनी राय दे दी है. उसका मानना है कि भारत को इस प्रस्तावित आरसीईपी में शामिल हो जाना चाहिए. इस समूह का कहना है कि भारत के आरसीईपी में से बाहर रहने का सवाल नहीं उठता है 'क्योंकि इसके कारण भारत एक बड़े क्षेत्रीय बाज़ार से बाहर हो जाएगा.'
इस समूह की अध्यतक्षता सुरजीत भल्ला कर रहे हैं जो प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार समिति के सदस्य रहे हैं. उनका कहना है कि इससे रुपया स्थिर रहेगा साथ ही सीमा शुल्क और कॉर्पोरेट टैक्स में भी कमी आएगी.
एशिया-प्रशांत के इन 16 देशों के पास वैश्विक जीडीपी का एक तिहाई हिस्सा है. अगर यह सफल रहा तो आरसीईपी 3.4 अरब लोगों का मार्केट बन जाएगा.
लेकिन इन 16 देशों के बीच आर्थिक और सांस्कृतिक विषमता बहुत बड़ी है. कुछ विषमताएं ऐसी हैं जो बाधा हैं. ऑस्ट्रेलिया अमीर देश है जहां की प्रति व्यक्ति न्यूनतम जीडीपी 55 हज़ार डॉलर से ज़्यादा है. कंबोडिया प्रति व्यक्ति 1,300 डॉलर के साथ आख़िरी नंबर पर है.
दूसरी तरफ़ भारत के बारे में कहा जा रहा है कि उसके लिए आरसीईपी किसी चुनौती से कम नहीं है. भारत की सबसे बड़ी चिंता इलेक्ट्रॉनिक डेटा शेयरिंग और लोकल डेटा स्टोरेज की मांग है.
सुरक्षा कारणों, राष्ट्र हित और गोपनीयता के लिहाज़ से इसे साझा करना आसान नहीं है. पर्यवेक्षकों का मानना है कि इन ज़रूरतों के कारण कई तरह की दिक़्क़ते आएंगी.
स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि भारत अगर इसमें शामिल होता है तो घरेलू उत्पाद बुरी तरह से प्रभावित होंगे. एसबीआई की रिपोर्ट तब आई है जब RCEP की अहम बैठक थाईलैंड में चल रही है. सात सालों की लंबी बातचीत के बाद नंवबर में इस पर फ़ैसला आना है.
एसबीआई की रिपोर्ट में कहा गया है, ''2018-19 में आरसीईपी के 15 में से 11 सदस्य देशों के साथ भारत का घाटे का व्यापार रहा. भारत का 2018-19 में व्यापार घाटा 184 अरब डॉलर का था. आरसीईपी के देशों से भारत का आयात 34 फ़ीसदी था और निर्यात महज 21 फ़ीसदी था.''
भारत के लिए इसमें और भी कई तरह की चुनौतियां हैं. ट्रेड यूनियन, सिविल सोसाइटी और स्वदेशी समूहों की अपनी-अपनी आपत्तियां हैं. ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड से डेयरी उत्पादों के आयात को लेकर सबसे बड़ी आपत्ति है.
इसके अलावा जेनरिक दवाइयों की सुलभता के साथ, खनन मुनाफ़ा, पानी, ऊर्जा, परिवहन और टेलिकॉम के निजीकरण भी बड़ी अड़चने हैं. इसके साथ ही आर्थिक विषमता भी एक मुद्दा है.
आरसीईपी देश आपसी मतभेदों को दूर करने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन चुनौतियां ख़त्म नहीं हुई हैं. इस महीने बैंकॉक में कई बैठकें हुई हैं. जिन मुद्दों पर अभी सहमति नहीं बन पाई हैं, वे हैं डेयरी उत्पाद, ई-कॉमर्स और प्रत्यक्ष निवेश.
आरसीईपी 16 देशों के बीच एक कारोबारी समझौता है जिसके तहत सदस्य देश आयात और निर्यात में टैरिफ़ कम करेंगे या पूरी तरह से ख़त्म कर देंगे. बिना कोई शुल्क वाले कारोबार को बढ़ावा दिया जाएगा.