В парламенте Британии 3 сентября начинается большая политическая битва: депутаты, вернувшись с каникул, попытаются сорвать планы премьер-министра Бориса Джонсона и предотвратить жесткий разрыв с ЕС 31 октября. Тем временем на континенте европейские популисты-евроскептики, насмотревшись на метания британцев и изучив результаты опросов, постепенно пришли к выводу, что они уже не хотят выходить из Евросоюза.
Три года назад многие из ведущих право-популистских партий континентальной Европы говорили о выходе своих стран из ЕС как о главной программной цели, причем цели, достижимой в самом близком будущем.
Теперь почти все они подогнали свои программные установки под один шаблон: они больше не хотят уничтожить Евросоюз, они лишь требуют его реформировать, отказаться от курса на строительство супергосударства, сократить штат и полномочия центральных органов - и только если эти их требования не будут выполнены, они "оставляют за собой право" призвать к проведению референдума о членстве в ЕС.
Такая позиция - вместе с повторяющимся лозунгом "Мы - за Европу отечеств" - включена сейчас в программы почти всех участников так называемого "альянса Сальвини" - союза евроскептиков, которые образовали в новом Европарламенте фракцию "Самобытность и демократия" (Identity and Democracy). В нее входят "Лига" итальянского вице-премьера Матео Сальвини, "Национальное объединение" француженки Марин Ле Пен, немецкая "Альтернатива для Германии" и еще несколько партий из разных стран Евросоюза.
Лишь один из этого альянса евроскептиков отказался изменять идее, оставил требование о выходе из ЕС в программе - и проиграл выборы.
Многие связывают этот сдвиг в позиции с обескураживающим примером Британии.
"Все шокированы тем, что происходит с политикой, экономикой и бюджетом Британии из-за антиевропейских настроений и "брексита" - причем еще до того, как Британия вышла из ЕС, - и понимают, что если сейчас пытаться продвигать эту идею среди своих избирателей - это будет гарантированная потеря голосов", - писал этой весной Денис Макшейн, бывший замминистра иностранных дел Британии по вопросам Европы.
Эксперты лондонского аналитического Центра за европейские реформы в 2016 году, сразу после референдума, прогнозировали всплеск антиевропейских настроений и требований провести такие же референдумы в нескольких странах ЕС. Сейчас они признают, что ошиблись.
Wednesday, August 28, 2019
Tuesday, August 20, 2019
कश्मीर: स्कूल तो खुल गए अब क्या है रणनीति?
भारत प्रशासित कश्मीर में मंगलवार को कर्फ़्यू का 17वां दिन है और यहां एक ऐसी स्थिति पैदा हो गई है जो लगातार एक सी ही बनी हुई है.
रोज़ाना शाम को जम्मू-कश्मीर का प्रशासन प्रेस कॉन्फ़्रेंस करता है और कल शाम सोमवार को भी हम प्रेस कॉन्फ़्रेंस में थे. कल की प्रेस कॉन्फ़्रेंस बहुत थोड़ी देर के लिए हुई और उसमें भी पत्रकारों के सवाल नहीं लिए गए.
प्रेस कॉन्फ़्रेंस में यह भी कहा गया कि कुल मिलाकर हालात सामान्य हैं और कहीं-कहीं कुछ प्रदर्शनकारी सुरक्षाबलों पर पथराव करते हैं जिनसे स्थानीय स्तर पर ही निपटा जाता है.
कल कश्मीर में पांचवीं कक्षा तक स्कूल खोले गए थे. इस पर प्रशासन ने जानकारी दी कि कुछ स्कूलों में छात्रों की उपस्थिति 30 से 50 फ़ीसदी रही लेकिन कुल मिलाकर अधिकतर स्कूलों में बच्चे नहीं आए.
मंगलवार को प्रशासन ने आठवीं क्लास तक के स्कूल खोलने की घोषणा की थी, लेकि अब इसे बुधवार से खोला जा रहा है.
शिक्षकों और छात्रों के स्कूलों तक न पहुंचने की एक वजह अधितकर जगहों पर सख़्त नाकेबंदी भी है. श्रीनगर के अलावा दक्षिणी कश्मीर के शोपियां, कुलगाम, बिजबेहड़ा में और बांदीपुरा, बारामुला, कुलगाम, सोपोर में सख़्त पाबंदियां हैं.
सरकार की पूरी कोशिश है कि स्कूल पूरी तरह से चालू हों लेकिन छात्रों के परिजन छात्रों की सुरक्षा को लेकर गंभीर हैं. वह चाहते हैं कि पहले छात्रों की सुरक्षा सुनिश्चित होनी चाहिए.
प्रशासन ने आदेश दिए हैं कि सरकारी कर्मचारियों को किसी भी हालत में दफ़्तरों में पहुंचना है तो वह अपनी और रिश्तेदारों की गाड़ियों में दफ़्तर जाते हैं. इसके अलावा अगर कोई बीमार है तो वह भी अपनी गाड़ियों में अस्पताल तक जाता है क्योंकि सार्वजनिक परिवहन बिलकुल बंद है.
इस तरह का ट्रैफ़िक सड़कों पर नज़र आता है. साथ ही कई जगहों पर सुरक्षा के नाम पर एक ओर की सड़क बंद रहती है जिसके कारण दोनों और का ट्रैफ़िक केवल एक ही सड़क पर चलता है.
आने-जाने में कोई दिक्कत नहीं है लेकिन हर नाके पर रोककर पहचान पत्र मांगा जाता है और पहचान पत्र न हो तो कर्फ़्यू पास मांगा जाता है.
पाबंदियों का सिलसिला बरक़रार है लेकिन कहा जाता है कि प्रशासन ने कर्फ़्यू में ढील दी है. कल ही प्रशासन ने पत्रकारों के लिए नए कर्फ़्यू पास जारी किए हैं लेकिन उन पर समाप्त होने की कोई तारीख़ नहीं है. इसका मतलब है कि कर्फ़्यू लंबा खिंच सकता है.
रोज़ाना शाम को जम्मू-कश्मीर का प्रशासन प्रेस कॉन्फ़्रेंस करता है और कल शाम सोमवार को भी हम प्रेस कॉन्फ़्रेंस में थे. कल की प्रेस कॉन्फ़्रेंस बहुत थोड़ी देर के लिए हुई और उसमें भी पत्रकारों के सवाल नहीं लिए गए.
प्रेस कॉन्फ़्रेंस में यह भी कहा गया कि कुल मिलाकर हालात सामान्य हैं और कहीं-कहीं कुछ प्रदर्शनकारी सुरक्षाबलों पर पथराव करते हैं जिनसे स्थानीय स्तर पर ही निपटा जाता है.
कल कश्मीर में पांचवीं कक्षा तक स्कूल खोले गए थे. इस पर प्रशासन ने जानकारी दी कि कुछ स्कूलों में छात्रों की उपस्थिति 30 से 50 फ़ीसदी रही लेकिन कुल मिलाकर अधिकतर स्कूलों में बच्चे नहीं आए.
मंगलवार को प्रशासन ने आठवीं क्लास तक के स्कूल खोलने की घोषणा की थी, लेकि अब इसे बुधवार से खोला जा रहा है.
शिक्षकों और छात्रों के स्कूलों तक न पहुंचने की एक वजह अधितकर जगहों पर सख़्त नाकेबंदी भी है. श्रीनगर के अलावा दक्षिणी कश्मीर के शोपियां, कुलगाम, बिजबेहड़ा में और बांदीपुरा, बारामुला, कुलगाम, सोपोर में सख़्त पाबंदियां हैं.
सरकार की पूरी कोशिश है कि स्कूल पूरी तरह से चालू हों लेकिन छात्रों के परिजन छात्रों की सुरक्षा को लेकर गंभीर हैं. वह चाहते हैं कि पहले छात्रों की सुरक्षा सुनिश्चित होनी चाहिए.
प्रशासन ने आदेश दिए हैं कि सरकारी कर्मचारियों को किसी भी हालत में दफ़्तरों में पहुंचना है तो वह अपनी और रिश्तेदारों की गाड़ियों में दफ़्तर जाते हैं. इसके अलावा अगर कोई बीमार है तो वह भी अपनी गाड़ियों में अस्पताल तक जाता है क्योंकि सार्वजनिक परिवहन बिलकुल बंद है.
इस तरह का ट्रैफ़िक सड़कों पर नज़र आता है. साथ ही कई जगहों पर सुरक्षा के नाम पर एक ओर की सड़क बंद रहती है जिसके कारण दोनों और का ट्रैफ़िक केवल एक ही सड़क पर चलता है.
आने-जाने में कोई दिक्कत नहीं है लेकिन हर नाके पर रोककर पहचान पत्र मांगा जाता है और पहचान पत्र न हो तो कर्फ़्यू पास मांगा जाता है.
पाबंदियों का सिलसिला बरक़रार है लेकिन कहा जाता है कि प्रशासन ने कर्फ़्यू में ढील दी है. कल ही प्रशासन ने पत्रकारों के लिए नए कर्फ़्यू पास जारी किए हैं लेकिन उन पर समाप्त होने की कोई तारीख़ नहीं है. इसका मतलब है कि कर्फ़्यू लंबा खिंच सकता है.
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